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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 53

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 42, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 53

संस्कृत श्लोक

जात्यन्धरूपानुभवानुरूपं यदागमैर्बुद्धमबोधरूपम् । अधस्पदीकृत्य तदान्तरेऽस्मिन्बोधे निपत्यानुभवो भवाभूः ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

हे भद्र. उपदेशवचनों से जन्मान्ध पुरुष के रूपानुभव के सदृश परोक्षरूप यदि आपने जाना, तो वह आपका न जानना ही है यानी अज्ञान ही है.क्योकि अपरोक्ष वस्तु के विषय में हुआ परोक्षज्ञान केवल भ्रमात्मक ही होता है । इसलिए ऐसे ज्ञान को तिरस्कृत कर प्रत्यगात्मस्वरूप इस नित्य अपरोक्ष आत्मज्ञान में पड़कर आप जन्मादिशून्य आत्मानुभवरूप ही बन जाइये, यही निर्वाण है