Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
अलमन्यैः परिज्ञानैर्वाच्यवाचकविभ्रमैः ।
अनहंवेदनामात्रं निर्वाणं तद्विभाव्यताम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
ङस प्रकार भोग्यवरतुओं से जो विरक्त हो गये हैं उनके लिए भोक्ता में अहंकाररुपी अंश का
एकमात्र त्याग कर देने से विशुद्ध बिन््मात्ररूप से अवशिष्ट निर्वाण सिद्ध हो जाता है, यह कहते हैं ।
भद्र, नामरूपात्मक विषयों के भ्रमस्वरूप दूसरे-दूसरे ज्ञानों का सम्पादन करना निरर्थक ही
है। केवल अहंबुद्धि का अभाव ही मोक्ष है, यह आप जानिये