Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
निम्नं विनैव तोयस्य न संभवति काचन ।
अर्थ एव मनस्कारो मन एवार्थरञ्जनम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
बाह्य अर्थो का बाध होने पर बाह्य इन्द्रियों का निरोध हो सकता ह. परन्तु मन का निरोध केसे
हो प्रकता है, यह कहते हैं ।
अर्थ (विषय) ही मन है और मन ही अर्थ है। जो बाह्य ओर आभ्यन्तररूप विषयाभास है, वह
मन ही है