Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
विभ्रमात्मा यथा यक्षो यक्षलोकश्च ते मिथः ।
सद्रूपौ सुस्थितौ मिथ्या तथाहंत्वजगद्भ्रमौ ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि भ्रान्तिकल्पित
भोक्तारूप होने से विभ्रमरूप यक्ष तथा भ्रान्तिकल्पित भोग्यस्वरूप होने से उसका नगर भी नहीं
है, तथापि परस्पर उपभोगरूप अर्थक्रियाकारी होने से जैसे वे दोनों सद्रूप की तरह स्थित हैं वैसे ही
मिथ्या अहन्ता ओर जगत् का भ्रम भी स्थित है