Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
इत्येवात्मपरिज्ञानादहमित्येव शाम्यति ।
ज्ञात्वा ज्ञानमयो भूत्वा सबाह्याभ्यन्तरार्थताम् ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसा केसे होगा 2 इस पर कहते है/
सृष्टि के प्रारम्भ में ज्ञानमय ब्रह्मा सर्वज्ञ होने के कारण सृष्टि करने योग्य सभी पदार्थों को
आत्मस्वरूप ही जानकर स्वयं उस तरह के ज्ञानयुक्त हिरण्यगर्भ होकर उसके संकल्प के अनुसार
बाह्य ओर आभ्यन्तर पदार्थरूपता को अपने शुद्ध आत्मस्वरूप का परित्याग न करते हुए ही ऐसे
प्राप्त हो गये, जैसे तरंगरूपता को जल