Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 43, Verse 63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 43, verse 63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 63
संस्कृत श्लोक
निर्विकारमलं ज्ञप्तेर्ज्ञेयान्तैकैव भासते ।
यथा योजनलक्षाभमेकमेवामलं नभः ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
सत्ता की एकता मे दूसरा द्रष्टान्त देकर उका उपपादन करते हैं /
जैसे लाखों योजनपर्यन्त दूर एक ही निर्मल आकाश भासता है, वैसे ही ज्ञेयपर्यन्त एक ही
अखण्डित निर्मल ज्ञान भासता है