Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
यथाकथंचिदुदितं दुःखेन स्वयमेव च ।
संसारवननिर्वेदं बीजमस्य विदुर्बुधाः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
शत्रुओं तथा सगे-सम्बन्धियों द्वारा हुए अपमान आदि से जन्य दुःख से या भाग्यवशात् अपने-
आप अथवा साधुओं या मित्रों आदि के उपदेश से या और किसी दूसरे निमित्त से तात्पर्य यह कि
जिस किसी तरह से उत्पन्न हुआ जो संसाररूपी वन में परम वैराग्य है, उसीको विद्वान् लोग
समाधिरूपी वृक्ष का बीज कहते हैं