Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति विश्रान्तवानेष मनोहरिणकोऽरिहन् ।
तत्रैव रतिमायाति न याति विटपान्तरम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे शत्रुनाशक श्रीरामजी, इस तरह ध्यानरूपी कल्पवृक्ष के
ऊपर विश्रान्ति ले रहा मनरूपी हरिण उसी वृक्ष पर प्रेम करने लग जाता है, दूसरे वृक्ष पर
नहीं जाता
सर्ग सन्दर्भ
चौवालीसवाँ सर्ग समाप्त पैतालीसवों सर्ग ध्यानरूपी वृक्ष के ऊपर मन को चढ़ाने का क्रम तथा उत्तरोत्तर भूमिकाओं में आरूढ हो रहे मन का सुखोत्कर्ष यह वर्णन ।