Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
नूनं विषयवैतृष्ण्ये परिप्रौढिमुपागते ।
न शक्नुवन्ति निर्हर्तुं ध्यानं सेन्द्राः सुरासुराः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि विषयों
से वैराग्य के अत्यन्त दृढ़ हो जाने पर मनुष्य के आत्मध्यान को इन्द्र के सहित सुर ओर असुर भी
नहीं हटा सकते