Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 60
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 60 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
भासते परमाभासरूपिणः काप्यवस्थितिः ।
बोधाबोधात्मकं चित्तं भाति शुष्कार्द्रकाष्ठवत् ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानी को तो परमप्रकाशस्वरूप इस संसार की कोई अपूर्व स्थिति भासती
है । ओर अर्धज्ञानी पुरुष का चित्त सूखे तथा गीले काठ के तुल्य बोध ओर अबोधरूप से स्थित
रहता है