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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 62

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 62 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 62

संस्कृत श्लोक

य एवास्याधिको भागस्तन्मयत्वेन तिष्ठति । बुधः सतत्त्वं नावैति जगतोऽभावभावयोः ॥ ६२ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञान ओर अज्ञान इन दोनों में जो भाग इसका प्रबल पड़ता है तद्रूप होकर यह रहता है, किन्तु जिसका ज्ञान (&) शतरंज या चौपड आदि खेलने के कपड़े या बिछौने की, जिस पर खाने बने रहते हैँ । परिपक्व हो चुका है वह तो जगत्‌ की सत्ता ओर असत्ता की यथार्थता बिलकुल ऐसे नहीं जानता