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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 65

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 65

संस्कृत श्लोक

ध्यानद्रुमात्स्वयमुपोढमनल्पपाकात्कालेन बोधमुपयातवतः क्रमेण । भुक्त्वा रसायनफलं परबोधमाद्यमिच्छन्मनोहरिणको निगडाद्विमुक्तः ॥ ६५ ॥

हिन्दी अर्थ

इतका सारांश यह निकला कि यह मन का नाश ही मनरुपीम॒य के बहाने वर्णित हुए आत्मा का मोक्ष हैं अक इस वर्णन का उपसंहार करते हैं / हे श्रीरामजी, अंकुर, काण्ड, शाखा, पल्लव, पुष्प तथा फलपर्यन्त परिणामरूप परिपाक होने से अपने समय से स्वयं बढ़े हुए ज्ञानरूपी फल को प्राप्त किये हुए इस ध्यानरूपी वृक्ष से दूसरे सर्वप्रथम परम रसायन अखण्डाकार वृत्तिअभिव्यक्त परमानन्दरूपी बोधफल का मुक्त होने की चाह कर रहा यह मनरूपी मृग आस्वाद लेकर इस संसाररूपी बन्धन से मुक्त हो जाता है