Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 46, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 46, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
प्रावृषीव नदीपूरो यः समाधिरुपस्थितः ।
बलादेव तमायातं भूयश्चलति नो मनः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
वर्षाकाल में नदी के प्रवाह के तुल्य एकमात्र आनन्दरस का आविर्भाव करानेवाली जो समाधि प्रथम
वृत्ति मे उपस्थित होती है उसकी गुडपिपीलिका न्याय के द्वारा (70) वस्तुस्वभावबल से ही एकाग्रता
को प्राप्त हो, आस्वाद लेता हुआ मन उससे फिर इधर-उधर चलायमान नहीं होता