Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
परस्वादानविरतिः पूर्वमेव प्रवर्तते ।
विवेकिनो निजार्थेषु संतोषश्चोपजायते ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
जो विवेकी है उसकी बुद्धि
पहले से ही दूसरे का धन लेने से विरत बनी रहती है और अपने ही अर्थो से उसे सन्तोष बना रहता
है