Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
ददाति कणपिण्याकशाकाद्यपि हि याचते ।
तेनैवाभ्यासयोगेन स्वमांसानि ददात्यसौ ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके पास जो कोई याचक आ जाय, उसे कण, पिण्याक (तिल या
सरसों की खली), शाक आदि जो कुछ भी हो दे देता है, उसी अभ्यासयोग के प्रभाव से याचको को
अपना मांस भी दे डालता है