Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
भ्रान्तिरभ्रमणाभ्यासात्प्रज्ञातैषोपशाम्यति ।
नोन्मत्तोऽस्मीति संबोधाच्छाम्यत्युन्मत्तता किल ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
अभ्रमता के अभ्यास से यानी सत्यस्वरूप
के अभ्यास से भलीभाँति स्वरूपतः ज्ञात हुई यह सांसारिक भ्रान्ति ऐसे शान्त हो जाती है, जैसे कि
“मैं उन्मत्त नहीं हूँ" इस दृढ़ ज्ञान से उन्मत्त पुरुष की निःसन्देह उन्मत्तता शान्त हो जाती है