Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
आतिवाहिकदेहोऽपि नीत्वा जीवपदं तथा ।
दृढेन बोधाभ्यासेन नेतव्यो ब्रह्मतामपि ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे भावना के बल से यह सूक्ष्म शरीर
स्थूलरूपता को प्राप्त होता है वैसे ही विवेकी पुरुष अभ्यास द्वारा दृढ़ की गई स्थिति के प्रसाद से
इस सूक्ष्म शरीर को ब्रह्महंभाव की एकमात्र वासना में पहुँचा देते हैं॥३ ६॥ तथा इस सूक्ष्म शरीर को
भी ब्रह्महंभाव की एकमात्र वासना में ले जा करके वहाँ से जीवरूपता को प्राप्त करा देते हैं और फिर
उस जीव को भी अपने दृढ़बोध के अभ्यास से ब्रह्मस्वरूप में पहुँचा देते हैं