Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
वासनाप्रत्यये शून्ये शून्यं व्योमैव शिष्यते ।
साप्यवस्था मनोऽसत्त्वे कुतस्त्याज्या विवेकिना ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
वासना की प्रतीति (वृत्ति) का नाश होने पर शून्य
चिदाकाश ही शेष रह जाता है ओर वह वासना की शून्यावस्था भी मन के न रहने पर ही सिद्ध होती
है । अतः वासनाशून्य मनरहित जो अवस्था सप्तम भूमिका में विवेकी पुरुष से प्राप्त है उसका भला
त्याग कैसे किया जा सकता है ? इसके त्याग में कोई हेतु नहीं दीखता, यह भाव है