Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 50, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
सर्वज्ञत्वात्सर्वगस्य सर्वं सर्वत्र विद्यते ।
येन स्वप्नवतां तेषां वयं स्वप्रनराः स्थिताः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
उनके हम स्वप्ननर हैं? यह जो बात कही गरु इसका उपपादन करते हैं /
हमारा देहादि प्रपंच यदि वासनारूप से उस सोये हुए के चित्त में होता तो हमारा देहादिप्रपंच
उसके चित्त में उत्पन्न हो जाता ओर हम लोग उसके स्वप्न के मनुष्य होते, परन्तु यह तो संभव
नहीं है, इस तरह का कोई यदि प्रश्न करे, तो उसका वैसा प्रश्न करना ठीक नहीं है, क्योंकि सबको
सत्ता देनेवाला मायाशबल ब्रह्म सर्वत्र रहता है और वह सर्वज्ञ है, इसी हेतु से सब जगह रह सकता
है, अतः हम लोग उनके स्वप्ननर हैं यानी वासनारूप से उन्हीं के अन्तःकरण में स्थित हैं और
वासना की समानता के कारण उनके स्वप्न में एक साथ अभिव्यक्त हो गये हैं