Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 51, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
चित्तमात्रे भ्रान्तिमात्रे स्वप्नमात्रात्मनि स्थिते ।
जगतीह पदार्थेभ्यः सत्यबुद्धिर्निवर्तते ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, चित्तमात्रस्वरूप यह जगत् जब
यहाँ भ्रान्तिरूप और स्वप्नमात्र स्वरूप बनकर स्थित हो जाता है यानी जब पुरुष जगत् को स्वप्न
के सदृश मिथ्या समझ लेता है, तब पदार्थो से सत्यत्वबुद्धि अपने आप हट जाती है