Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 51, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
यत्र नात्मा न शून्यं च न जगत्कलना न च ।
न चित्तदृश्योदयधीः सर्वं चास्ति यथास्थितम् ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र,
जो तत्पद वस्तु है, उसमें न आत्मा है, न शून्य है और न जगत् की कल्पना ही है, अधिक क्या
कहें, उसमें न चित्त है, न दृश्यबुद्धि है और न वह यथास्थित सब कुछ ही है