Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 52, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 52, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 52 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
एवं तत्र स्थिताः सर्वे भावा एवं च न स्थिताः ।
असर्वात्मैव सर्वात्म तदेव न तदेव च ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस्रीलिए निह नानास्ति किंचन' इत्यादि तथा सदेव सोम्यदमग्र आसीत् इत्यादि श्रुतियों के
अविरोध से एक ही का दोनों तरह से कथन होता है इस आशय से कहते हैं ।
इस तरह सभी पदार्थ उस परमात्मा में अधिष्ठान रूपसे स्थित है तथा अपने स्वरूप से नहीं
भी स्थित हैं । वह परमात्मा असर्वात्मक होता हुआ भी सर्वस्वरूप है । वह परमार्थरूप भी है और
परमार्थरूप नहीं भी है