Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 53, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 53, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
जगच्चिद्ब्रह्मभावाच्च तथा भावो भ्रमादिव ।
सर्वमेकमजं शान्तमद्वैतैक्यमनामयम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह यद्यपि असल में जगत् चिद्-ब्रह्मरूप
ही है, तथापि जो घट,पट आदि आकार आपाततः (ऊपर-ऊपर से) प्रतीत होते हैं, वे सब
भ्रमसे ही सिद्ध होते हैँ । ऐसी स्थिति में हे श्रीरामचन्द्रजी सब कुछ एक, अज शान्त, द्रैत-
एेक्य से रहित निरामय ब्रह्मरूप ही है, यह आप जानिये