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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 55, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

न त्वमूर्तो हि चिद्धातुः कारणं भवितुं क्वचित् । स्वात्मा शक्तः स मूर्तानां बीजमुर्वीरुहामिव ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

उत्पत्तिवाद में तो अवश्य ही बीज बतलाना चाहिए, परन्तु वह बतलाया जा ही नहीं सकता; यों जो बार-बार कटा ग्या है उसका स्मरण कराते हैं / आकार के बिना चितितत्त्व कहीं पर भी कारणरूप नहीं हो सकता, जैसे साकार वृक्षों को साकार बीज उत्पन्न करता है, वैसे ही साकार स्वात्मा ही मूर्त पदार्थों को उत्पन्न कर सकता है, परन्तु वह साकार तो है नहीं