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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

यथा यथा विलोक्यते तथा तथा विलीयते । इहाज्ञतापिशाचिका तथा विचारिता सती ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

तथा जानवार्नो को ज्यों- ज्यों अपना अनुभव बढ़ता जाता है त्यो-त्यो करमशः अज्ञान का नाश भी होता जाता है, यह कहते हैं / जैसे-जैसे यह अज्ञतारूपी पिशाचिका अनुभव में आरूढ होती जाती है वैसे -वैसे विचारित होकर नष्ट होती जाती है