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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

सति सर्गे त्वविद्यायाः संभवो नान्यतः क्वचित् । सति द्वितीये शशिनि द्वितीयो विद्यते शशः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

अविद्या की सृष्टि रहने पर ही उसका अस्तित्व भी है, अन्य किसी दूसरे कारण से कहीं नहीं है । द्वितीय चन्द्रमा के रहने पर ही द्वितीय खरगोश दीख पड़ता है