Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 58, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
सर्गेषु नाणुरप्यस्ति न ब्रह्मात्मैव यः सदा ।
ब्रह्मसर्गास्तथेत्येष वाचि भेदो न वस्तुनि ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
हिरण्यगर्भ के निर्मित संसारों में ऐसा कोई सूक्ष्मातिसूक्ष्म भाग
नहीं हैं, जो सदा ब्रह्मरूप ही न हो, किन्तु सदा से ही वे सब ब्रह्मस्वरूप है, इसलिए ब्रह्म
तथा सर्ग यह केवल वाणी में ही भेद है, वस्तु में भेद नहीं है