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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 58, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

भूताकाशे महत्यस्मिन्खशून्यत्वमनुज्झति । सन्ति सर्गसहस्राणि कथयेति प्रदर्श्यते ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा थावपवार्थों के उदराधिष्ठानभरूत चेतन में जिस तरह हजारे सष्टियों का सम्भव हैं, उसी तरह शून्यात्सक आकाशरूप अभावाधिष्ठान चेतन में भी असकीर्ण रुप से समस्त जग्रत्‌ का आरोप सभव है इस आशय से कहते हैं । आकाश की शून्यता को न छोड़नेवाले महान्‌ भूताकाश में यानी अभावाधिष्ठानभूत चेतन में भी हजारों सर्गा का आरोप हो सकता है, यह बतलाने के लिए प्रस्तुत कथा कही गई है