Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अहं त्रैलोक्यवृन्दानि संसाराणां शतानि च ।
तत्र ब्रह्माण्डलक्षाणि पश्याम्यगणितान्यपि ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
भूताकाश की अवस्था
को प्राप्त चिदाकाश में मैं तीनों लोकों के झुण्डों को, सैकड़ों संसारों को और लाखों अगणित
ब्रह्माण्डों को देखने लगा