Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
त्रिःपृथ्व्यादीनि चान्यानि द्विःपृथ्व्यादीन्यथापि च ।
तथा सप्तमहाभूतान्येकजातिमयानि च ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
किन्हीमे पृथ्वी, जल, तेज ये तीन ही थे, किन्हीं में कोई ओर ही भूत थे, किन्हीं मे तो
पृथ्वी और जल ये दो ही थे, किन्हीमें सात भूत (काल और दिशा को भूत मानकर) थे तथा किन्हीं
में एकजाति के ही सब पदार्थ थे