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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 42

संस्कृत श्लोक

फलानि तान्यनन्तानि परमार्थमहातरोः । अनन्यान्येव चान्यानि तन्मयान्येव वै ततः ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा वृक्ष और फल के सदश उनमें भेद और अभेद की कल्पना है, यह कहते हैं। परमार्थ चैतन्यरूप महावृक्ष के वे अनन्त फल थे, वे अनन्य ही होते हुए भी उससे भिन्न-से थे