Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
अन्यान्यज्ञातकालानि यदृच्छावशतः स्वयम् ।
जायमानानि पुष्टानि सुस्थिराणि स्थितानि च ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
सूर्य का अभाव होने से किन्हीं में कालज्ञान
ही न हो पाता था, कुछ तो काकतालीय न्याय से अकस्मात् ही स्वयं उत्पन्न, पुष्ट और सुदृढ़
स्थिति बनाकर स्थित थे