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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 63

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 63

संस्कृत श्लोक

प्रजायमानानि नभस्यनन्ते विशीर्यमाणानि च निर्निमित्तम् । तदा त्वहं वै तिमिराक्षदृष्टकेशोण्ड्रकानीव जगन्त्यपश्यम् ॥ ६३ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, मैंने उस समय की समाधि में अनन्त चिदाकाश में किसी कारण के बिना उत्पन्न हुए तथा किसी कारण के बिना ही जीर्ण-शीर्ण हो जानेवाले अनन्त जगत्‌ देखे जो तिमिररोगयुक्त आँखों से दिखाई पड़नेवाले केशोण्ड्क के सदृश भ्रान्तिमात्र से सिद्ध थे