Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verses 34–35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 6, verses 34–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 34,35
संस्कृत श्लोक
अद्य त्वेते परिज्ञाता मया स्वविषयारयः ।
कष्टा इन्द्रियनामानो वञ्चयित्वा तु मां पुनः ॥ ३४ ॥
संसारजङ्गले शून्ये दग्धं नरमृगं शठाः ।
आश्वास्याश्वास्य निघ्नन्ति विषयेन्द्रियलुब्धकाः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
शब्दादि विषयरूप भूत ही मन को बाहर
खींचकर अपने-अपने भोगों के लिए श्रोत्र आदि भाव से स्थित हैं। इन कष्टदायक इन्द्रियनामवाले
अपने विषयरूपी शत्रुओं को आज मैंने अच्छी तरह पहचान लिया । ये विषय और इन्द्रियरूपी शठ
शिकारी शून्य संसाररूपी जंगल में सन्तप्त नररूपी मुझ मृग को धोखे से फँसाकर बार-बार
आश्वासन दे देकर मार रहे हैं