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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 6, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

श्रीमत्यपि पतन्त्याशु शातनाः कातरादयः । गुणवत्युग्रपत्रेऽपि तुहिनानीव पङ्कजे ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

विद्याधर तो सम्पूर्ण विद्याओं के आश्रय होने से अपने विद्याबल से ही समस्त दुःखो को दूर करने में समर्थ होते हैं; क्योकि मणि-मन्त्र- रसायनादि की भिषद्धि्यो तथा अणिमादि ऐश्वर्यों से वे युक्त रहते हैं; यह छुना जाता हैं, तो फिर यों श्रीसम्यन्न दुमसें कामादि दुःख यातनाएँ तथा कातरता और कार्पण्यादि दोष कयो आकर गिर पड़े 2 जिससे कि श्रेष्ठ देवयोनि में उत्पन्न होने से अत्यन्त सवके मान्य होते हुए भी तुम आज निकृष्ट काकयोनि में पेदा हुए भी मेरी शरण आये हो ओर मोह से अपने उद्धार का कारण मुझसे पूछ रहे हो 2 इस आशंका पर कह रहे हैं । सम्पूर्ण विद्याओं तथा अनेकविध सिद्धियों आदि श्रीसम्पत्तियों एवं अनेक प्रकार के गुणों से युक्त रहते विद्याधरों में भी अजितेन्द्रिय होने के कारण आत्मज्ञानशून्य होने से काम, क्रोध, ईर्ष्या, असूया आदि दुःख यातनाएँ और कायरता दोष ऐसे शीघ्र गिरते हैं, जैसे लक्ष्मी के आधार विष तन्तुओं से युक्त उग्र पर्तोवाले कमल के ऊपर तुषार गिरते हैं