Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 60, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
लुठत्सुरपुरव्रातवितताक्रन्दघर्घरान् ।
रणसर्वाद्रिकटकश्रेणीनिगिरणोद्भटान् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इधर-उधर लुढ़कते हुए देवनगरों के समूहों के व्यापक क्रन्दनों के कारण घर्घर शब्द कर रहे समस्त
पर्वतो की नितम्ब श्रेणियों को निगल जाने में अतिउद्भट कल्पान्त कालों को वे जगत् परस्पर नहीं
जानते