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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 60, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

तत्र क्वचिदनादित्ये निरहोरात्रभूतले । आकल्पयुगवर्षान्ते जगत्यूहैः क्षयोदयः ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, उस तरह अनेक प्रकार के जो ब्रह्मांड आपको बतलाये, उनमें जो चितिरूप वस्तु है, उसी में तर्का से यानी संकल्पं से उनका विनाश और उदय मैंने देखा । चिद्रस्तु में न तो आदित्यमण्डल है, न दिन, रात या भूतल है और न कल्प, युग और वर्ष की समाप्ति ही है