Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 60, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
यद्यथा बुध्यते बोधे यथोदेत्यथवा स्वतः ।
तथाशु स्फुटतामेति सद्वासद्वा तदेव तत् ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसा क्यो; इस पर कहते हैं /
भद्र, दीर्घकाल के अभ्यास से दृढ़ किये गये बोध में जो वस्तु जैसी हितसाधन या अहितसाधन
के रूप में मानी जाती है, वह वैसी ही स्वयं अपने भोग हेतु अदृष्ट के कारण बन जाती है । जैसी
बनती है ठीक वैसी ही भोगकाल में विस्पष्ट बन जाती है। वह वस्तु दूसरी जगह सत् हो या असत्
हो, इस विषय में कुछ भी विशेषता नहीं रखती, क्योंकि वह भ्रमरूप ही है और वह ब्रह्म ही
वासनानुसार वैसा विवर्तित हो जाता है