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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 60, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

शास्त्रवेदविहीनानि निर्धर्माण्येव कानिचित् । यत्किंचनैककारीणि तिर्यग्वन्ति जगन्त्यधः ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

कहीं पर भूमि आदि लोकों के नीचे के जगत्‌ केवल पशु आदि प्राणियों से ही भरे हैं उनमें मनुष्यों का नाम ही नहीं है, न तो इनमें वेद और शास्त्र का प्रचार है, न कोई धर्म है, न इनका कोई उत्तम आचरण है यानी यथेष्टाचरण करनेवाले हे