Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 60, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 60, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 60 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
पवनाशनभूतानि समरत्नाश्मकानि च ।
अजातार्थान्यलुब्धानि निगर्वाणीव कानि च ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर तो केवल सर्प ही सर्प हैं, कहीं पर तो सभी रत्न ही रत्न हैं या तो पत्थर ही पत्थर
हैं, कहीं पर तो धन आदि का व्यवहार ही नहीं है, अतएव लोभरहित हैं और कहीं पर प्राणियों में
अहंकार की मात्रा ही नहीं है