Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 61, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 61, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
वे ही मन अपने अन्दर रहने वाली योग्य कासना.ओ को जगद् के आकार मे विकामित करने के
कारण अनन्त जगद्गप बन गये हैं; यह कहते है /
विशद आकाशरूप वे ही हम लोगों के मन हैं और वे ही स्वयं चारों ओर से अनन्त जगत् के रूप
में परिणत हो गये हैं