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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 61, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 61, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 61 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

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हिन्दी अर्थ

गद्यभाग से जिस अर्थ की चिद्धि की गहै उस अर्थ का अब पद्य से उपसंहार करते हैं / हे श्रीरामजी, इसलिए किसी की न तो कुछ सृष्टि होती है, न किसी समय कुछ नष्ट होता है और न कभी कुछ उत्पन्न होता है, यह जो कुछ दृश्य है, सब शान्त, अज, ब्रह्मरूप ही स्थित है