Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 62, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
यथाम्भो रसतां वेत्ति शैत्यं वेत्ति यथा हिमम् ।
स्पन्दं वेत्ति यथा वायुस्तथैतद्वेत्ति शुद्धधीः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
यह सारा विश्व हमारे सामने उपस्थित है । बोधस्वरूप
आत्मा के साथ एकता को प्राप्त हुआ मैं घर के भीतर और बाहर के देश को इन नाना जगत् समूहों
से परिपूर्ण समझता हूँ ॥|११॥ जैसे जल रसता को जानता है, जैसे हिम शीतलता को जानता है,
जैसे स्पन्दन को हवा जानती है, वैसे ही शुद्धवुद्धि ज्ञानी पुरुष इस संसार को भी जानता है