Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 62, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
अहमाकाशमात्रात्मा सा खमात्रशरीरिणी ।
जगज्जालं खमात्रं तदिति तत्र तदा स्थितम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
आकाशस्वरूप मैं था, आकाशमय शरीरधारिणी
वह थी तथा आकाशमय वह सारा संसारसमूह भी उस समय चिदाकाश में ही स्थित था