Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 62, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
यथा स्वप्ने नृभिर्युद्धकोलाहलगमागमाः ।
असन्तोऽप्यनुभूयन्ते संसारनिकरास्तथा ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्न मेँ न रहते
हुए भी युद्ध के कोलाहल तथा यातायात का मनुष्य अनुभव करते हैं, वैसे ही ये जगत् के समूह
मनुष्यों द्वारा अनुभूत हो रहे हैं