Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 62, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
स्वप्नजन्तुरिव व्योम्नि भाति प्रथमसर्गतः ।
प्रभृत्येव विराडात्मा खे खमेव परस्परे ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
चुषुप्तिसद्ृश प्रलय के अनन्तर प्रथम सर्ग से ही स्वप्नजन्तु की तरह कल्पना रूप विराटात्मा
चिदाकाश मेविदाकाथ का ही विस्तार करता है, यह कहते हैं /
सुषुप्तिसदृश प्रलय के अनन्तर आकाश में स्वप्न के जीव के सदृश प्रथम सर्गं से ही विराट्-
रूप चिदाकाश ही चिदाकाश में परस्पर विषय-विषयीरूप से सापेक्ष होकर भासता है