Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 65, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 65, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 65 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
वृद्ध एकान्तरसिको नीरसः स्नेहवर्जितः ।
भर्ताऽजिह्ममतिर्मौनी किं मन्ये जीवितेन मे ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले तो मेने यह विचारा-मेरा स्वामी अब बूढ़ा हो गया, एकान्तमें ही उसे सदा प्रेम है,
नीरस है, मेरी ओर उसको तनिक भी स्नेह नहीं, मौनव्रतधारी है, उसका चित्त अति कोमल
है, अतः अब मैं अपने जीवन से क्या फल मानूँ