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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 65, Verse 20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 65, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 65 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

अथ स्वजगतो दृष्ट्वा हृदयं तस्य बाह्यगा । अहं दृष्टवती स्थूलां लोकालोकगिरेः शिलाम् ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन्‌, तदनन्तर अपने वासस्थानभूत ब्रह्माण्ड के अन्दर की सभी वस्तुओं को देखकर बाहर निकली और निकलकर मैंने पूर्ववर्णित अपने ही जगत्‌ के अन्दर की इस ब्रह्माण्ड के लोकालोक पर्वत के ऊपर स्थित एक स्थूल शिला देखी