Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 67, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
योऽभ्यासः प्रकचत्यन्तः शुद्धचिन्नभसो रसात् ।
भवेत्तन्मयमेवान्तराबालमिव लक्ष्यते ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
भगवन्, जो भी
अभ्यासजनित संस्कार शुद्ध चिदाकाश के रस से उद्बुद्ध होकर प्रकट होता है, उसी रूपका भीतरी
अन्तःकरण मानों हो ही जाता है, यही बाल्यावस्था से लेकर वस्तुस्थिति है