Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 67, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 67, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 67 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
स्वजगत्संतताभ्यासवशतो मां कथाभ्रमः ।
नूनमाक्रान्तवानेष द्वयोर्हि बलवाञ्जयी ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
सतत अभ्यास के लिए को असाध्य वस्तु हैं ही नहीं; यह कहती हैं /
भगवन्, यह जो आपके साथ संवादात्मक कथाभ्रम हुआ, उसने अपने जगत् के निरन्तर
अभ्यास के वश से पूर्वजगत् के भ्रम से ग्रस्त मुझको वश में कर दिया, इसलिए वह संस्कार तिरोहित
हो गया, क्योकि भूतकाल का भ्रम ओर वर्तमानकाल का भ्रम- इन दोनों में वर्तमानकाल का भ्रम
बलवान होने के कारण विजयी हुआ